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मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच टकराव का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की एक रिपोर्ट के अनुसार यदि यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो इससे कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है, जिससे भारत में महंगाई और आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। देश की लगभग 85-90% तेल की जरूरतें आयात से पूरी होती हैं। ऐसे में यदि वैश्विक बाजार में तेल महंगा होता है या आपूर्ति में बाधा आती है तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आता है तो परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ेगा। इससे महंगाई दर में वृद्धि हो सकती है और आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है तो भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) लगभग 0.36 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। इसका मतलब है कि देश का आयात बिल बढ़ेगा और विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ेगा।
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से रुपये पर भी दबाव पड़ सकता है। आयात महंगा होने से विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है, जिससे रुपये की कीमत कमजोर हो सकती है और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और नीति निर्माता स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। जरूरत पड़ने पर ईंधन करों में बदलाव, वैकल्पिक तेल आपूर्ति और रणनीतिक भंडार जैसे कदम उठाए जा सकते हैं ताकि अर्थव्यवस्था पर असर कम किया जा सके।