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लेंसकार्ट विवाद: बिंदी-तिलक पर रोक के पुराने दस्तावेज पर सीईओ पीयूष बंसल ने मांगी माफी, कहा- कंपनी सभी धर्मों का सम्मान करती है

सम्वाद मीडिया न्यूज | 16 अप्रैल 2026, नई दिल्ली लेंसकार्ट के कर्मचारी स्टाइल गाइड में बिंदी, तिलक और सिंदूर पर लगाई गई रोक को लेकर उत्पन्न विवाद के बीच कंपनी के सह-संस्थापक और सीईओ पीयूष बंसल ने शुक्रवार को सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए पुराने दस्तावेज में हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर पाबंदी लगाए जाने का आरोप लगने के बाद भारी आलोचना हुई थी।विवाद की शुरुआत तब हुई जब फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने लेंसकार्ट के ‘स्टाफ यूनिफॉर्म और ग्रूमिंग गाइड’ का एक पन्ना शेयर किया। इसमें स्पष्ट रूप से लिखा था कि कर्मचारी धार्मिक टीका, तिलक, बिंदी या स्टिकर नहीं लगा सकते। वहीं, हिजाब और पगड़ी को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी गई थी। इस भेदभावपूर्ण नीति को लेकर सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया और कई यूजर्स ने इसे “कॉर्पोरेट जिहाद” करार देते हुए लेंसकार्ट के boycott की अपील की।पीयूष बंसल का स्पष्टीकरण और माफीपीयूष बंसल ने X (पूर्व ट्विटर) पर विस्तृत पोस्ट कर स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा:

“वायरल हो रहा दस्तावेज पुराना है और कंपनी की वर्तमान एचआर पॉलिसी नहीं है। यह गलती कभी नहीं होनी चाहिए थी। संस्थापक और सीईओ होने के नाते इस चूक की पूरी जिम्मेदारी मेरी है।”

बंसल ने आगे बताया कि कंपनी ने इस गलती को 17 फरवरी 2026 को ही सुधार लिया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि लेंसकार्ट अब किसी भी कर्मचारी को अपनी आस्था से जुड़े प्रतीक — बिंदी, तिलक, सिंदूर, कलावा या कोई अन्य धार्मिक चिह्न — पहनने से नहीं रोकती। कर्मचारी गर्व के साथ अपनी संस्कृति और परंपरा को व्यक्त कर सकते हैं।सीईओ ने माना कि पुरानी ट्रेनिंग सामग्री में भाषा की चूक हुई थी और कंपनी इसकी जांच कर रही है कि ऐसा कंटेंट ट्रेनिंग मटेरियल में कैसे शामिल हो गया। उन्होंने उन सभी का आभार जताया जिन्होंने मुद्दा उठाया, क्योंकि इससे कंपनी को अपनी कमियां सुधारने का मौका मिला।कंपनी का आधिकारिक स्टैंडलेंसकार्ट ने स्पष्ट किया कि वह भारत में भारतीयों के लिए बनी कंपनी है और उसके हजारों कर्मचारी अपनी संस्कृति और आस्था को गर्व से लेकर चलते हैं। कंपनी सभी धर्मों और परंपराओं का पूरा सम्मान करती है।यह घटना एक बार फिर कॉर्पोरेट जगत में धार्मिक संवेदनशीलता और समावेशिता के महत्व को रेखांकित करती है। सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि ऐसी नीतियां बनाते समय सांस्कृतिक संदर्भ को ध्यान में रखना जरूरी है, ताकि किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस न पहुंचे।

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