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कुरुक्षेत्र में जन्मदिन की खुशी मातम में बदल गई…
3 साल की मासूम बेटी को फंदे पर लटकाकर मां-बाप ने खुद भी जान दे
दीहरियाणा के कुरुक्षेत्र में कुछ दिन पहले हरिश इच्छा मृत्यु (सामूहिक आत्महत्या) की घटना ने पूरे क्षेत्र को स्तब्ध कर दिया था। उसकी यादें अभी ताजा नहीं हुई थीं कि 20 अप्रैल 2026 (सोमवार) को प्रेम नगर कॉलोनी में एक और बेहद दर्दनाक और हृदयविदारक घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया।30 वर्षीय जतिंदर कुमार (रेलवे मेल सर्विस में कार्यरत) और उनकी 28 वर्षीय पत्नी युक्ता (कुछ रिपोर्टों में मंजू भी) ने अपनी मात्र 3 वर्षीय बेटी अद्विका के तीसरे जन्मदिन के दिन ही यह अकल्पनीय कदम उठा लिया।दंपति ने पहले अपनी नन्ही अद्विका को कमरे की छत के हुक पर काली चुनरी से लटका दिया। फिर खुद भी फंदे पर झूल गए — पिता दाईं ओर नई रस्सी से और मां बाईं ओर। बीच में उनकी मासूम बेटी। उन्होंने कमरे का पंखा और झूमर हटाकर यह व्यवस्था की थी।रात के अंधेरे में यह सब करने के बाद जतिंदर ने सुबह करीब 5:30 बजे अपने जीजा को ऑटो-टाइमर व्हाट्सएप मैसेज भेजा —
“हम जान दे रहे हैं… मां को संभाल लेना।”
मैसेज में कमरे की चाबी कहां रखी है, यह भी बता दिया था।जब जीजा और उनकी पत्नी पहुंचे तो दरवाजा तोड़कर अंदर गए। अंदर का मंजर देखकर उनका कलेजा मुंह को आ गया — तीनों शव फंदों पर लटक रहे थे। पुलिस को सूचना दी गई। सब-इंस्पेक्टर और DSP सुनील कुमार की टीम मौके पर पहुंची। शवों को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया।
पीछे का कारण
घर में मिले 10 पृष्ठों के सुसाइड नोट में दंपति ने साफ लिखा कि उनकी बेटी अद्विका को सेरेब्रल हाइपोक्सिया (Cerebral Hypoxia) की गंभीर बीमारी थी, जिससे वह आंशिक रूप से लकवाग्रस्त (paralysed) भी थी। लगातार इलाज, भारी आर्थिक बोझ और भविष्य की चिंता ने उन्हें मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया। कोई पारिवारिक विवाद या पुरानी शिकायत नहीं थी।
यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक चीख है। जब मां-बाप अपनी बीमार बच्ची को दुनिया की तकलीफों से बचाने के नाम पर खुद ही उसकी जिंदगी छीन लेते हैं, तो समाज को सोचना चाहिए। ऐसे परिवारों को आर्थिक मदद, मानसिक सहारा और बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए।अद्विका का जन्मदिन — जो केक, हंसी और तोहफों का दिन होना चाहिए था — पूरे परिवार के लिए मातम का दिन बन गया। तीन छोटे-छोटे दिल एक साथ धड़कना बंद हो गए।हरिश इच्छा मृत्यु जैसी घटनाएं हमें बार-बार याद दिलाती हैं कि तनाव और निराशा कितनी घातक हो सकती है। अगर आपके आस-पास कोई परिवार बीमारी, आर्थिक संकट या मानसिक दबाव से गुजर रहा हो तो कृपया उनकी मदद करें, उनसे बात करें, उन्हें अकेला न छोड़ें।