Popular Posts

शिकारी खुद शिकार: BJP ने ममता की 2011 वाली ‘स्क्रिप्ट’ से ही TMC को तोड़ दिया?

2026 के विधानसभा नतीजों ने साफ कर दिया था कि तृणमूल कांग्रेस के पास पहले जैसा चुनावी बारूद नहीं बचा। लेकिन असली झटका संगठन के भीतर से आया है। आज स्थिति यह है कि कभी पार्टी की सुप्रीमो रहीं ममता बनर्जी को बागी खेमे ने महज ‘एडवाइजर’ बनाकर किनारे करने की कोशिश की है, और वे अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी और पार्टी के बीच फंसी दिख रही हैं। 

बगावत की नई तस्वीर

कहानी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के नाम से शुरू हुई। अभिषेक बनर्जी और प्रदेश उपाध्यक्ष रतिंद्र बोस ने स्पीकर को चिट्ठी देकर सोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष, असीमा पात्रा को डिप्टी और फिरहाद हकीम को चीफ व्हिप बनाने की घोषणा की।

बागी गुट ने इसे मानने से इनकार कर दिया। ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उनके पास 80 में से 60 विधायकों के हस्ताक्षर हैं, और उन्होंने खुद को नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया। उनके साथ जावेद अहमद खान, शबीना यास्मीन, शीलू साह और संदीपन साह को उपनेता, और अखरुजमा को चीफ व्हिप बताया गया।

2011 की स्क्रिप्ट, 2026 में रिवर्स

AajTak के विश्लेषण के मुताबिक, BJP और बागी गुट ने वही ‘साम, दाम, दंड, भेद’ अपनाया है, जिसे ममता ने 2011 में लेफ्ट को उखाड़ने के लिए इस्तेमाल किया था।

1. साम: समझाकर हवा निकालना

2011 में ममता ने ‘परिवर्तन’ के नारे से लेफ्ट कैडर को समझाया था कि वाम का दौर खत्म हो चुका है, और अब्दुल रज्जाक मोल्ला, परेश अधिकारी जैसे चेहरों को अपने पाले में लिया था। 

2026 में यही काम उल्टा हुआ। विधायकों को समझाया गया कि ममता के नेतृत्व में भविष्य नहीं है, और ‘भाइपो’ को आगे बढ़ाने की राजनीति से करियर खत्म होगा। ऋतब्रत बनर्जी ने इसी असंतोष को मंच दिया। 

2. दाम: सत्ता का लालच

तब ममता ने लेफ्ट-कांग्रेस के पार्षदों और पंचायत नेताओं को सुरक्षा और प्रभाव बचाने का ‘दाम’ दिया था, जिससे रातोंरात निकाय TMC में चले गए थे। 

अब बागी गुट ने 60 विधायकों को नए सत्ता समीकरण में राजनीतिक सुरक्षा का वादा किया। नतीजा, अभिषेक की लिस्ट धरी रह गई और संख्या बल बागियों के पास चला गया।

3. दंड: डर का शिकंजा

2011 के बाद लेफ्ट कार्यकर्ताओं पर पुराने केस, दफ्तरों पर कब्जा और ‘इलाका दखल’ की नीति चली थी। 

इस बार रफ्तार तेज रही। रिपोर्ट के मुताबिक, एक तरफ बगावत का ऐलान हुआ, दूसरी तरफ ED की पूछताछ अभिषेक बनर्जी तक पहुंची। पुराने घोटालों की फाइलें खुलने और प्रशासनिक दबाव से कई नेता कट-मनी लौटाने लगे और डर से बागी खेमे में चले गए। 

4. भेद: घर में फूट

ममता ने 2011 में कांग्रेस के साथ जीतने के बाद मालदा-मुर्शिदाबाद में मौसम नूर, मानस भुइयां जैसे नेताओं को तोड़कर कांग्रेस को लगभग खत्म कर दिया था। 

आज TMC उसी ‘भेद’ की शिकार है। पार्टी में पुराने गार्ड (सोभनदेब, फिरहाद) बनाम नई ब्रिगेड (अभिषेक टीम) की पुरानी दरार को बागियों ने हथियार बना लिया। जब अभिषेक ने अपने लोगों के नाम आगे बढ़ाए, तब तक भीतर खेल हो चुका था। 

निष्कर्ष: इतिहास का रिप्ले

2011 में ममता को 34 साल पुराने लेफ्ट किले को गिराने में पांच साल लगे थे। 2026 में वही तरीका BJP और बागियों ने एक महीने के भीतर दोहरा दिया। फर्क सिर्फ किरदारों का है, स्क्रिप्ट वही है — साम, दाम, दंड, भेद। 

ममता ने जिस चक्रव्यूह से विरोधियों को घेरा था, आज वे खुद उसी में खड़ी हैं — न पार्टी पूरी तरह बचा पा रही हैं, न भतीजे को।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *