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पाकिस्तान में जैसे किसी अनदेखी “धुरंधर 3” की शुरुआत हो चुकी हो—कहानी वही, किरदार नए, और अंत लगभग तय। हर कुछ दिनों में एक नई खबर आती है, और स्क्रिप्ट में बस नाम बदल जाता है। ताज़ा मामला खैबर पख्तूनख्वा का है, जहां लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के वरिष्ठ कमांडर Sheikh Yousuf Afridi को 26 अप्रैल 2026 को अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। दिलचस्प बात ये है कि इस “सीरीज़” का सबसे रहस्यमय किरदार अभी भी वही है—“unknown gunmen”, जो हर बार आते हैं, काम करते हैं और बिना कोई सुराग छोड़े गायब हो जाते हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला बेहद प्रोफेशनल तरीके से अंजाम दिया गया। Khyber Pakhtunkhwa के एक इलाके (कुछ रिपोर्ट्स में लांडी कोटल का जिक्र) में अफरीदी पर करीब से कई राउंड फायर किए गए। हमला इतना अचानक और सटीक था कि उसे बचने का कोई मौका नहीं मिला। हमलावर मौके से तुरंत फरार हो गए और हमेशा की तरह, पीछे छोड़ गए कई सवाल—लेकिन जवाब एक भी नहीं।
भारतीय मीडिया संस्थानों जैसे NDTV और Zee News ने सुरक्षा सूत्रों के हवाले से इस घटना की पुष्टि की है। शुरुआती संकेत पाकिस्तान की तरफ से भी मिलते हैं, हालांकि आधिकारिक तौर पर विस्तृत बयान अब तक सामने नहीं आया है। यही वजह है कि यह घटना जितनी साफ दिखती है, उतनी ही धुंधली भी है।
अगर बात करें Sheikh Yousuf Afridi की, तो उसे लश्कर-ए-तैयबा के नेटवर्क में एक अहम कड़ी माना जाता था। वह Hafiz Saeed का करीबी सहयोगी बताया जाता है और खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में संगठन की पकड़ मजबूत करने, नए लोगों की भर्ती और नेटवर्क फैलाने में उसकी भूमिका मानी जाती थी। कुछ रिपोर्ट्स में उसका नाम कट्टरपंथी भर्ती नेटवर्क से भी जोड़ा गया है, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है।
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे अहम हिस्सा सिर्फ यह एक हत्या नहीं है—बल्कि इसका पैटर्न है। पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान के भीतर कई ऐसे लोग, जो किसी न किसी आतंकी नेटवर्क से जुड़े बताए जाते हैं, इसी तरह “अज्ञात हमलावरों” के निशाने पर आए हैं। कभी कराची, कभी पंजाब, तो कभी खैबर पख्तूनख्वा—लोकेशन बदलती रहती है, लेकिन तरीका लगभग वही रहता है। इससे पहले भी हाल ही में एक और आतंकी की इसी तरह हत्या की खबर सामने आई थी, जिसमें शुरुआती तौर पर व्यक्तिगत दुश्मनी या लोकल विवाद जैसे एंगल सामने आए थे।
यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ “किसे मारा गया” का नहीं, बल्कि “कौन मार रहा है” का बन गया है। क्या ये आतंकी संगठनों के अंदरूनी झगड़े हैं? क्या अलग-अलग गुटों के बीच संघर्ष बढ़ गया है? या फिर कोई ऐसी छुपी हुई रणनीति चल रही है, जिसके बारे में सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा जा रहा? फिलहाल इन सभी सवालों के जवाब “unknown” की कैटेगरी में ही आते हैं।
पूरी स्थिति को देखें तो यह किसी थ्रिलर फिल्म जैसी जरूर लगती है—जहां हर एपिसोड में एक नया मोड़ आता है—लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल और गंभीर है। हर ऐसी घटना क्षेत्र की सुरक्षा, आतंकी नेटवर्क्स और उनके बदलते समीकरणों की तरफ इशारा करती है।
अंत में कहानी फिर वहीं आकर रुक जाती है—एक और नाम, एक और हमला, और वही पुराना बयान:
“अज्ञात हमलावर फरार हैं, जांच जारी है।”