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मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला विवाद में बड़ा प्रशासनिक बदलाव सामने आया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने नया आदेश जारी करते हुए हिंदू श्रद्धालुओं को भोजशाला परिसर में साल के 365 दिन पूजा करने की अनुमति दे दी है। इसके साथ ही आधिकारिक रिकॉर्ड और शीर्षक से “कमाल मौला मस्जिद” शब्द भी हटा दिया गया है। अब यह परिसर केवल “भोजशाला” के नाम से जाना जाएगा।
यह फैसला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के ऐतिहासिक निर्णय के बाद लिया गया है, जिसमें भोजशाला परिसर को देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र माना गया था। अदालत ने ASI के 2003 वाले उस आदेश को भी रद्द कर दिया था, जिसमें हिंदू पूजा को सीमित कर मुस्लिम पक्ष को शुक्रवार की नमाज की अनुमति दी गई थी।
ASI के नए आदेश के अनुसार अब भोजशाला में “मंगलवार-शुक्रवार” वाला पुराना नियम लागू नहीं रहेगा। पहले हिंदुओं को केवल मंगलवार को पूजा की अनुमति थी, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज की इजाजत दी जाती थी। अब यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई है।
हिंदू श्रद्धालु अब पूरे वर्ष प्राचीन परंपराओं के अनुसार मां वाग्देवी की पूजा, पाठ और धार्मिक गतिविधियां कर सकेंगे। प्रशासनिक नियंत्रण और परिसर का संरक्षण ASI के पास ही रहेगा।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ASI की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट को महत्वपूर्ण आधार माना। अदालत ने कहा कि भोजशाला परिसर में मिले स्तंभ, मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख, घंटियां और स्थापत्य शैली स्पष्ट रूप से इसे हिंदू मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र साबित करते हैं।
कोर्ट ने यह भी माना कि यहां हिंदू पूजा की परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। अदालत ने केंद्र सरकार और ASI को परिसर के प्रबंधन और व्यवस्था संबंधी फैसले लेने का अधिकार दिया।
फैसले के बाद मुस्लिम संगठनों और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है। AIMPLB ने कहा है कि वह कमाल मौला मस्जिद समिति को कानूनी सहायता देगा।
वहीं हिंदू पक्ष ने भी सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर कहा है कि बिना उनकी बात सुने कोई आदेश पारित न किया जाए।
फैसले और नए आदेश के बाद धार शहर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। प्रशासन और पुलिस को अलर्ट मोड पर रखा गया है ताकि किसी भी प्रकार की तनावपूर्ण स्थिति से बचा जा सके।