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भारत अब अपनी ऊर्जा और रणनीतिक संसाधनों की जरूरतों के लिए नए साझेदारों की तलाश में जुट गया है। हाल ही में हुए भारत-अफ्रीका समिट और बदलते वैश्विक हालात के बीच भारत ने तेल और रेयर अर्थ (rare earth) खनिजों के लिए अफ्रीका को एक मजबूत विकल्प के रूप में देखना शुरू किया है। यह कदम पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करने और आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पश्चिम एशियाई देशों पर निर्भर रहा है, खासकर कच्चे तेल के मामले में। लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन में अस्थिरता और कीमतों में उतार-चढ़ाव के चलते अब भारत अपनी रणनीति में बदलाव कर रहा है। इसी क्रम में अफ्रीका को एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखा जा रहा है।
अफ्रीका में दुनिया के बड़े हिस्से में तेल, गैस और खासकर रेयर अर्थ मिनरल्स के भंडार मौजूद हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), रक्षा उपकरणों और ग्रीन टेक्नोलॉजी के लिए बेहद जरूरी हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, अफ्रीका के पास वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों का बड़ा हिस्सा मौजूद है, जिसे भारत अपने भविष्य के विकास के लिए अहम मान रहा है।
हाल ही में आयोजित India-Africa Summit में दोनों पक्षों के बीच व्यापार, ऊर्जा और खनिज संसाधनों को लेकर सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया। भारत का फोकस अब केवल तेल आयात तक सीमित नहीं है, बल्कि वह रणनीतिक खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
दूसरी ओर, चीन का रेयर अर्थ सप्लाई पर मजबूत नियंत्रण भी भारत की इस रणनीति को और जरूरी बनाता है। ऐसे में अफ्रीका भारत के लिए एक वैकल्पिक और भरोसेमंद स्रोत के रूप में उभर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी विकास दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।